Mumbai crime story

Saddam Husain story

📖 चैप्टर 1: एक बच्चे का जन्म — दर्द, गरीबी और एक अनकही शुरुआत 28 अप्रैल 1937… 🌑 मध्य पूर्व की तपती हुई ज़मीन पर बसे देश Iraq के एक छोटे से गाँव Al-Awja में, जो Tikrit के पास था, एक ऐसा बच्चा जन्म ले रहा था जिसकी कहानी दुनिया को बाद में हिला देगी, लेकिन उस पल… उस पल वहाँ सिर्फ दर्द था, सन्नाटा था और गरीबी की भारी चादर पूरे माहौल पर पड़ी हुई थी 😔 उस झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि छत के कोनों से हवा अंदर घुसती थी, दीवारें मिट्टी की थीं और फर्श पर बिछी एक पुरानी चटाई ही उस घर की असली पहचान थी, वहीं एक माँ अपने बच्चे को जन्म देने की पीड़ा सह रही थी, उसका नाम था सुभा तुल्फ़ाह, एक ऐसी औरत जो पहले ही जिंदगी से टूटी हुई थी 💔 उसका पति, हुसैन अब्द अल-मजीद, इस दुनिया में नहीं था… कुछ लोग कहते हैं वह मर चुका था, कुछ कहते हैं वह छोड़कर चला गया था, लेकिन सच्चाई यही थी कि उस बच्चे के जन्म से पहले ही उसके सिर से पिता का साया उठ चुका था 😢 उस माँ की हालत सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद खराब थी, उसने पहले भी एक बेटे को खो दिया था और अब वह इस नए बच्चे को जन्म देने से डर रही थी 😣 ...

हाजी मस्तान चैप्टर नंबर 1 सुल्तान मिर्जा



1936 की तपती धूप में तमिलनाडु के पाना परामकुडी के एक छोटे से कस्बे में एक बच्चा पैदा हुआ, जिसका नाम रखा गया मस्तान मिर्जा।
गांव की गलियों में लाल मिट्टी की खुशबू फैली रहती, और मिट्टी के घरों की टीन की छतें गर्मी में तवे जैसी तपने लगती थीं।
उसके पिता मामूली साइकिल मैकेनिक थे, जिनकी रोज़ी इतनी कम थी कि कई बार घर में चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो जाता।
माँ पूरे घर को संभालते हुए हर निवाले को बचाकर अपने बच्चों के पेट भरने की कोशिश करती थीं, पर फिर भी भूख कई रातों की मेहमान बनती थी।
बचपन में मस्तान नंगे पाँव, धूल से सनी पगडंडियों पर दौड़ता, जैसे किसी दौड़ में जीतना ही उसका सपना हो।
उसके कपड़े अक्सर फटे रहते, लेकिन चाल में एक अजीब आत्मविश्वास था जो गांव के बड़े-बूढ़े भी नोटिस करते थे।
पढ़ाई में उसका मन लगता था, पर किताबों से ज़्यादा उसे मछुआरों की समुद्री यात्राओं की कहानियाँ खींच ले जाती थीं।
शाम होते ही वो तट के पास बैठ जाता, बुज़ुर्ग मछुआरों से उन दूर-दराज़ के जहाज़ों और अजनबी बंदरगाहों के किस्से सुनने के लिए।
हर कहानी में उसे लगता कि समंदर के पार कोई जादुई दुनिया है, जहाँ गरीबी और भूख का नाम तक नहीं।
स्कूल की फीस के लिए पिता को कई-कई दिनों तक बिना रुके साइकिल के टायर बनाने पड़ते, पर मस्तान जानता था कि ये काफी नहीं है।


चैप्टर नंबर 2
कभी-कभी वो बाज़ार में छोटे-मोटे काम कर लेता, ताकि घर के लिए चावल या गुड़ का टुकड़ा ला सके।
गांव में त्योहार के दिन जब बच्चे नए कपड़े पहनते, तो मस्तान चुपचाप किनारे खड़ा होकर उन्हें देखता, बिना जलन के, लेकिन मन में कुछ करने की ठानते हुए।
उसकी आंखों में सपनों की एक अजीब चमक थी, जैसे वो जानता हो कि एक दिन इस मिट्टी से बहुत दूर जाएगा।
गांव में अक्सर सुनाई देता कि मुंबई एक ऐसी जगह है जहाँ मेहनत करने वाला भी सोने में तोलने लायक अमीर बन सकता है।

हर बार जब कोई मुंबई से लौटकर आता और अपनी कमाई का बखान करता, मस्तान के दिल में आग और तेज़ जलने लगती।
समंदर किनारे खड़ा होकर वो अक्सर कल्पना करता कि किसी दिन एक बड़ा जहाज़ उसे मुंबई के तट तक पहुँचा देगा।
परिवार की गरीबी बढ़ती जा रही थी, और पिता की कमाई से घर का खर्च पूरा होना नामुमकिन लगने लगा था।
एक दिन पिता ने धीरे से कहा — “बेटा, शायद तुझे भी शहर जाना पड़े, वरना यहां हम भूख से मर जाएंगे।”
मस्तान ने उस रात नींद नहीं ली, बस छत पर लेटकर तारे गिनता रहा और सोचता रहा कि मुंबई कैसा होगा।
सुबह होते ही उसने मन में ठान लिया कि अब उसके सपनों का सफर शुरू होगा, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो।
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Chapter 2 Maa ka dard bhara kahani




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सुबह के धुंधलके में मस्तान ने अपने पिता की आँखों में चिंता की गहरी लकीरें देखीं, जो धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थीं।
गांव की तंग गलियों में दिन-ब-दिन गरीबी का साया फैलता जा रहा था, जैसे आसमान पर छाए बादल सूरज को निगल रहे हों।
कभी-कभी तो घर में चाय तक के लिए दूध नहीं होता, और बच्चे सिर्फ पानी में गुड़ डालकर पीकर सो जाते।
मस्तान की छोटी बहनें अक्सर भूख से रोते-रोते सो जातीं, और मां चुपचाप उनके सिर पर हाथ फेरतीं।
उसकी मां की गोद ही उसका असली घर थी, जहां थकान और भूख दोनों मिट जाती थीं।
पिता पूरे दिन साइकिल की मरम्मत करते, पर दिन ढलते ही उनका चेहरा थकान से झुक जाता।
मस्तान समझ चुका था कि इस छोटे से कस्बे में रहकर उनका जीवन कभी नहीं बदलेगा।
वो अक्सर अपने पिता से पूछता — “अब्बा, मुंबई में सब अमीर हो जाते हैं क्या?”
पिता आधी मुस्कान के साथ कहते — “मेहनत करने वाला वहां भूखा नहीं सोता बेटा।”
ये शब्द मस्तान के दिल में जैसे पत्थर पर खुद गए, और हर दिन उसकी बेचैनी बढ़ाने लगे।
वो जब भी बाज़ार में मुंबई से आए यात्रियों को देखता, उनकी चाल और कपड़े उसे अलग ही दुनिया के लगते।



सुल्तान मिर्जा चैप्टर नंबर 3

समंदर किनारे खड़े होकर मछली पकड़ते बुज़ुर्ग अब उसके लिए सिर्फ कहानीकार नहीं थे, बल्कि सपनों के दरवाज़े थे।
हर शाम वो तट पर जाकर दूर क्षितिज में गायब होते जहाज़ों को देखता, और सोचता एक दिन मैं भी जाऊंगा।
उसकी मां को उसके ये सपने सुनकर हल्की सी मुस्कान आती, लेकिन आंखों में चिंता भी तैर जाती।
“बेटा, शहर बड़े होते हैं, पर वहां का दिल उतना बड़ा नहीं होता” — मां अक्सर चेतावनी देतीं।
मस्तान जानता था कि मां डर रही है, पर उसका मन गांव में कैद रहना नहीं चाहता था।

गांव में सूखा पड़ने लगा, खेत बंजर हो गए, और मछली पकड़ने वाले भी खाली जाल लेकर लौटने लगे।
खाने का संकट इतना बढ़ा कि कई घरों में लोग दिन में सिर्फ एक बार खाना खाने लगे।
मस्तान ने छोटे-मोटे काम करने शुरू कर दिए — कभी सामान ढोना, कभी मछली का बोझ उठाना।
इन पैसों से वो अपनी बहनों के लिए गुड़ और नारियल लाता, ताकि उनकी भूख थोड़ी मिट सके।
लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा हो रहा था, वैसे-वैसे घर की ज़रूरतें भी बढ़ती जा रही थीं।
मां की तबियत अक्सर खराब रहने लगी, पर वो दर्द छिपाकर रोज़ का काम करती रहतीं।
कभी रात में खांसते-खांसते उनकी सांस फूल जाती, तो मस्तान पानी का लोटा पकड़कर उनके पास दौड़ आता।
गांव में डॉक्टर बहुत कम थे, और दवाई का खर्च उठाना भी पिता के बस से बाहर था।
पड़ोस की औरतें कहते-कहते थक जातीं कि शहर जाकर इलाज करवाओ, वरना देर हो जाएगी।
लेकिन शहर तक पहुंचने के लिए जो पैसे चाहिए थे, वो घर में मौजूद ही नहीं थे।
मस्तान ने सोचा कि अगर वो मुंबई चला जाए तो जल्दी पैसे कमा सकेगा।
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