Mumbai crime story

Saddam Husain story

📖 चैप्टर 1: एक बच्चे का जन्म — दर्द, गरीबी और एक अनकही शुरुआत 28 अप्रैल 1937… 🌑 मध्य पूर्व की तपती हुई ज़मीन पर बसे देश Iraq के एक छोटे से गाँव Al-Awja में, जो Tikrit के पास था, एक ऐसा बच्चा जन्म ले रहा था जिसकी कहानी दुनिया को बाद में हिला देगी, लेकिन उस पल… उस पल वहाँ सिर्फ दर्द था, सन्नाटा था और गरीबी की भारी चादर पूरे माहौल पर पड़ी हुई थी 😔 उस झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि छत के कोनों से हवा अंदर घुसती थी, दीवारें मिट्टी की थीं और फर्श पर बिछी एक पुरानी चटाई ही उस घर की असली पहचान थी, वहीं एक माँ अपने बच्चे को जन्म देने की पीड़ा सह रही थी, उसका नाम था सुभा तुल्फ़ाह, एक ऐसी औरत जो पहले ही जिंदगी से टूटी हुई थी 💔 उसका पति, हुसैन अब्द अल-मजीद, इस दुनिया में नहीं था… कुछ लोग कहते हैं वह मर चुका था, कुछ कहते हैं वह छोड़कर चला गया था, लेकिन सच्चाई यही थी कि उस बच्चे के जन्म से पहले ही उसके सिर से पिता का साया उठ चुका था 😢 उस माँ की हालत सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद खराब थी, उसने पहले भी एक बेटे को खो दिया था और अब वह इस नए बच्चे को जन्म देने से डर रही थी 😣 ...

हाजी मस्तान चैप्टर नंबर 2 सुल्तान मिर्जा


चैप्टर नंबर 4। 😭
उसकी आंखों में एक साथ डर और उम्मीद का तूफ़ान उठ रहा था, जैसे बारिश से पहले का आसमान।
मां को उसकी ये बेचैनी महसूस होने लगी, लेकिन वो कुछ कहती नहीं, बस उसे ज्यादा दुलार करने लगीं।
एक दिन मां ने उसे गोद में बिठाकर कहा — “बेटा, चाहे जहां रहना, पर दिल साफ रखना।”
मस्तान ने मासूमियत से सिर हिलाया, लेकिन अंदर से उसे लग रहा था कि कुछ बुरा होने वाला है।
दिन गुजरते गए, और मां की तबियत तेजी से बिगड़ने लगी, वो अब उठकर रसोई तक भी नहीं जा पाती थीं।
पिता दिनभर काम पर रहते, और मस्तान मां के पास बैठकर उनका माथा सहलाता।
उसकी छोटी बहनें समझ नहीं पातीं कि मां अब पहले जैसी क्यों नहीं हैं।
गांव के पुजारी और मौलवी दोनों ही आकर दुआ करते, लेकिन मां की हालत में कोई सुधार नहीं होता।
मस्तान हर रात चुपचाप रोता, ताकि मां उसे कमजोर न समझें।
एक सुबह, सूरज की पहली किरण से पहले, घर के भीतर एक गहरी खामोशी छा गई।
मां की सांसें थम चुकी थीं, और उनकी आंखें बंद थीं जैसे वो गहरी नींद में हों।

चैप्टर नंबर 5
मस्तान सिर्फ 12 साल का था, पर उस पल उसे लगा कि उसके कंधों पर पूरा आसमान टूटकर गिर गया है।
गांव की औरतें रो-रोकर मातम कर रही थीं, और पिता खामोश खड़े थे जैसे उनकी दुनिया खत्म हो गई हो।
मस्तान मां के पास बैठा रहा, उनके हाथ को थामे, मानो उन्हें जाने से रोक लेगा।
पर अब मां उस जगह चली गई थीं, जहां से कोई लौटकर नहीं आता।
उस दिन मस्तान ने महसूस किया कि अब उसकी ज़िन्दगी का रास्ता बदल चुका है।
उसके दिल में एक गहरी कसम जन्म ले चुकी थी — गरीबी को हराकर, मां के सपनों को पूरा करना है।
मां के जाने के बाद घर में जैसे चूल्हे की लौ भी ठंडी पड़ गई, और हर कोने में सन्नाटा फैल गया।
पिता की आंखों में अब पहले से ज्यादा थकान और अकेलापन उतर आया था, लेकिन उन्होंने चुपचाप अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाई।
मस्तान अपनी उम्र से ज्यादा बड़ा हो गया था, जैसे बचपन उससे जबरदस्ती छीन लिया गया हो।
वो छोटी-छोटी मजदूरी करता, कभी बाज़ार में बोरे ढोता, कभी खेतों में पानी खींचने का काम करता।
गांव में लोग कहते कि इतनी कम उम्र में इतना काम कोई नहीं कर पाता, पर मस्तान के पास और रास्ता ही क्या था।
पिता और बेटा दोनों दिनभर मेहनत करते, ताकि घर में कम से कम एक वक्त की रोटी पक सके।
इन छोटे-छोटे पैसों को वो बहुत संभालकर रखता, जैसे कोई अपनी जान से प्यारी चीज़ संभालता हो।
मां के गुजरने के बाद बहन और भी चुप रहने लगी थी, उसकी मासूम हंसी जैसे कहीं खो गई थी।
मस्तान जानता था कि बहन की शादी कर देना उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि मां के जाते-जाते यही कहा था — “मेरी बेटी का घर बसा देना।”
समय के साथ कुछ पैसे जमा हुए, और मस्तान ने पिता के साथ मिलकर एक अच्छे लड़के की तलाश शुरू की।
गांव के बुजुर्ग और रिश्तेदार मदद करने लगे, क्योंकि सब जानते थे कि मस्तान का दिल कितना साफ है।
आखिरकार, पास के ही एक कस्बे में एक मेहनती और अच्छे स्वभाव का लड़का पसंद आ गया।
निकाह की तारीख तय हुई, और मस्तान ने अपनी सारी बचत उसी दिन के लिए निकाल ली।
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