मन्या सुर्वे : बचपन की दर्दनाक दास्तान
सन 1944 का साल था। महाराष्ट्र के कोंकण इलाके का एक छोटा-सा गाँव, जहाँ मिट्टी की पगडंडियाँ और टपकती झोपड़ियाँ ही जिंदगी का आईना थीं। उसी गाँव के एक गरीब किसान परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया – मनोहर अर्जुन सुर्वे। वही मनोहर अर्जुन, जो आगे चलकर पूरी मुंबई के लिए मन्या सुर्वे बना।
लेकिन उस समय कौन जानता था कि यह मासूम बच्चा, जो माँ की गोद में मिट्टी से खेल रहा है, उसका बचपन गरीबी और बेबसी की आग में तपकर एक अलग ही इंसान बना देगा।
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गरीबी का बोझ
मन्या का परिवार बेहद गरीब था। पिता दिन-रात खेतों में मजदूरी करते, लेकिन इतनी कमाई नहीं होती कि पेट भर सके। माँ पास-पड़ोस के घरों में बर्तन माँजती, कभी कपड़े धोती, तो कभी मजदूरी पर जाती। घर की हालत ऐसी थी कि बरसात आते ही छत से पानी टपकता और पूरा कमरा गीला हो जाता। ठंड में रजाई नहीं थी, गर्मियों में पसीना सुखाने तक का कपड़ा नहीं
मन्या के बचपन का हर दिन भूख से लड़ते हुए गुजरता। कभी पेट भरता, तो कभी आधा ही रह जाता। माँ अक्सर अपनी थाली बच्चे को थमा देती और खुद भूखी रह जाती। जब मन्या छोटा था, तब वह समझ नहीं पाता कि माँ क्यों खाना नहीं खाती। लेकिन जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसने देख लिया कि माँ अपनी भूख दबाकर सिर्फ बेटे का पेट भरना चाहती है।
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चैप्टर नंबर 2
मासूम ख्वाहिशें
गाँव के दूसरे बच्चों के पास खिलौने होते। कोई गिल्ली-डंडा खेलता, कोई लकड़ी की कार। लेकिन मन्या के पास कुछ भी नहीं। उसका खिलौना मिट्टी के ढेले और पत्थर होते। जब कभी वह किसी बच्चे के हाथ में नया खिलौना देखता, तो उसकी आँखें चमक उठतीं, लेकिन अगले ही पल माँ का थका हुआ चेहरा उसे याद दिला देता कि उनका घर तो रोटी तक के लिए तरसता है।
मन्या अपनी माँ से कहता,
“आई, मेरे लिए भी खिलौना ला दो ना।”
माँ मुस्कुराती और कहती,
“बेटा, तू बड़ा होकर खूब पढ़ाई कर। तेरे पास सब कुछ होगा।”
मन्या माँ की बात सुनकर चुप हो जाता। माँ की आँखों में सपना था – मेरा बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।
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स्कूल का संघर्ष
मन्या पढ़ाई में अच्छा था। लेकिन स्कूल तक पहुँचना आसान नहीं था। गाँव से स्कूल तीन-चार किलोमीटर दूर था। नंगे पैर वह धूप में तपती मिट्टी पर चलता। बरसात में गीली कीचड़ और कांटों से भरी पगडंडी पार करता। पैरों में चप्पल नहीं थी, बस छाले और खून।
स्कूल की कक्षा में उसके पास किताबें भी नहीं थीं। अक्सर वह दूसरे बच्चों की पुरानी फटी किताबों से पढ़ाई करता। स्लेट टूटी हुई थी, लेकिन वह उसी पर बार-बार लिखता और मिटाता। कभी पेंसिल नहीं खरीदी, बस कोयले के टुकड़े से लिखाई करता।
लेकिन उसकी लगन ऐसी थी कि मास्टरजी तक हैरान रहते। वे अक्सर कहते –
“मंगल्या, तू गाँव का सबसे तेज़ लड़का है। अगर तू मेहनत करता रहा तो अफसर बनेगा।”
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