काली रात का जन्म
काली रात थी। आसमान पर बादल ऐसे जमा थे जैसे किसी ने सारे तारे निगल लिये हों। हवा में अजीब-सी चुप्पी थी, और गाँव के छोर पर बनी मिट्टी की झोपड़ी से बस एक औरत की कराहट सुनाई दे रही थी। यह कराहट दर्द की थी, और इस दर्द के बीच एक बच्चा पैदा हुआ — नाम रखा गया अब्दुल लतीफ़।
उस रात चाँद बादलों में कहीं खो गया था। झोपड़ी के भीतर मिट्टी का दीया टिमटिमा रहा था, जिसकी रोशनी मुश्किल से चार दीवारों तक पहुँच रही थी। औरत, यानी उसकी माँ, बच्चे को सीने से चिपकाए रो रही थी। रोने में खुशी कम और चिंता ज़्यादा थी — “हे अल्लाह, मैं इस मासूम को कैसे पालूँगी?”
गरीबी इतनी गहरी थी कि घर में खाने को कुछ नहीं था। लकड़ी का टूटा-फूटा बक्सा, जिसमें कपड़ों की जगह खालीपन था। मिट्टी का चूल्हा, जिसमें हफ़्तों से धुआँ नहीं उठा। पेट भरने को बच्चे कई बार सिर्फ़ पानी पीकर सो जाते, कभी नमक रोटी, तो कभी सूखी मुठ्ठी भर चना।
अब्दुल लतीफ़ सात भाई-बहनों में से एक था। घर इतना छोटा कि सब एक-दूसरे से सटे-सटे सोते। बरसात आती तो छत से पानी टपकता, गर्मी आती तो मिट्टी की दीवारें तवे की तरह जलने लगतीं। माँ बच्चों को गोद में लेकर हवा करती, मगर हवा भी जैसे गरीबी के आँचल से छीन ली गई थी।
पिता छोटा-मोटा मज़दूर था। दिन भर पसीना बहाकर जो कमाता, उससे मुश्किल से दाल-चावल आता। कई बार तो कर्ज़ पर अनाज लेना पड़ता, और बदले में अपनी इज़्ज़त गिरवी रखनी पड़ती। पड़ोसी ताने मारते – “इतने बच्चे पैदा कर लिये, अब पालोगे कैसे?” और माँ चुपचाप आँखों में आँसू भर लेती।
Ok
चैप्टर नंबर 2
अब्दुल लतीफ़ का बचपन इन चीखों, तानों और भूख की आग में बीता। वह अक्सर देखता कि उसकी माँ रात को खाना छोड़ देती ताकि बच्चे खा सकें। छोटे हाथों से वह माँ का आँचल खींचकर पूछता – “अम्मी, आप क्यों नहीं खाती?” माँ मुस्कुराकर झूठ बोल देती – “बेटा, मुझे भूख नहीं है।” लेकिन उसकी आँखों में छुपी सच्चाई लतीफ़ के दिल में कहीं गहरे उतरती जा रही थी।
दिन का उजाला भी उनके लिए मुश्किल था। धूप में पिता मज़दूरी करता, माँ घर संभालती, और बच्चे गली-गली भटकते। कई बार तो कूड़े से खिलौने चुनकर खेलते। गली के बच्चे मिठाई खाते, और लतीफ़ बस दूर खड़ा देखता। दिल में सवाल उठता – “क्यों हम इतने ग़रीब हैं? क्यों हमारा हिस्सा बस भूख और आँसू है?”
गरीबी ने बचपन की मासूमियत छीन ली थी। पाँच साल का होते-होते उसने यह सीख लिया कि रात को भूख मिटाने का सबसे आसान तरीका है – पानी पीकर सो जाना। कभी-कभी माँ बच्चों को बहलाने के लिए कहती – “देखो, अल्लाह ने चाँद निकाला है, वह हमें देख रहा है, कल अच्छा दिन आएगा।” लेकिन बच्चों को यह कल कभी नहीं दिखता।
गाँव की काली गलियाँ उसके मन में डर और नफ़रत दोनों भरतीं। जब-जब वह देखता कि अमीरों के घरों में रोशनी जलती है, थाली में खाना सजा होता है, तो उसके अंदर एक आग भड़क उठती। यह आग छोटी उम्र में ही उसके दिल को कठोर बनाने लगी थी।
चैप्टर नंबर 3
उसका बचपन खेल और हँसी से दूर, बस भूख, तंगहाली और माँ की मजबूर मुस्कान में बीता। एक-एक दिन उसकी आँखों में यह यक़ीन पक्का होता गया कि गरीबी इंसान को रौंद देती है। माँ की झुकी कमर, पिता का थका हुआ चेहरा और भाई-बहनों की भूख से तड़पती आँखें – यही उसकी पहली किताब थी, यही उसका पहला सबक़।🥺
कहते हैं बच्चे मिट्टी की तरह होते हैं, जैसा माहौल मिले, वैसा रूप ले लेते हैं। अब्दुल लतीफ़ की मिट्टी में गरीबी का पानी मिला था, और इस मिट्टी से जो पौधा उगा, उसमें दर्द, भूख और बग़ावत की जड़ें गहरी थीं।
उस काली रात से शुरू हुई उसकी ज़िंदगी में रोशनी कम और अंधेरा ज़्यादा था। मगर यही अंधेरा आगे चलकर उसे गुजरात का सबसे बड़ा नाम, अंडरवर्ल्ड का बादशाह बना देगा।
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