चैप्टर नंबर 4
काली रात और भूख की चीख
काली रात थी। आसमान घने बादलों से ढका हुआ था, और पवन भी जैसे थम-सी गई थी। गाँव की गलियाँ वीरान, और किसी झोपड़ी से आती कराहट इस सन्नाटे को चीर रही थी। उसी झोपड़ी में, टूटी खटिया पर, एक औरत दर्द से तड़प रही थी। कराहट इतनी गहरी कि लगता था मानो पूरी धरती उसकी पीड़ा से काँप उठे। कुछ ही देर में रोने की एक नई आवाज़ गूँजी—यह था एक मासूम का जन्म। उसका नाम रखा गया अब्दुल लतीफ़।
पर उस रात खुशियाँ नहीं थीं। माँ ने बच्चे को सीने से लगाया तो सही, मगर आँखों में आंसू थे। वह जानती थी—इस घर में एक और पेट जुड़ गया है, जबकि पहले से ही सात पेटों की भूख पूरी नहीं होती। घर इतना ग़रीब कि रोटी का टुकड़ा भी सपना लगता।
झोपड़ी का हाल किसी कैदखाने से कम न था। छत तिनकों से ढकी, हर बरसात में टपकती। मिट्टी की दीवारें दरारों से भरी। कोनों में अंधेरा, और बीच में चूल्हा, जिसमें महीनों से सही तरह आग नहीं जली थी। माँ अपने बच्चे को गोद में लेकर सोचती—“हे अल्लाह, यह मासूम किस गुनाह की सज़ा भुगतने आया है?”
🥺
दिन और रात दोनों घर वालों के लिए एक समान थे—भूख से भरे। कभी नमक रोटी, कभी सूखी मुठ्ठी भर चना, और कई बार सिर्फ़ पानी पीकर सो जाना। सबसे छोटा लतीफ़ जब रोता, तो माँ के पास दूध तक नहीं होता। पड़ोसिन ताने मार देती—“इतने बच्चे पैदा कर लिये, अब पालोगे कैसे? दूसरों से भीख माँगोगी?” माँ चुपचाप सिर झुका लेती।
चैप्टर नंबर 5
गाँव में गरीबी का मज़ाक उड़ाना आम बात थी। जब लतीफ़ के पिता मज़दूरी से लौटते, तो लोग कह देते—“इतनी मेहनत कर ली, फिर भी घर का चूल्हा खाली क्यों है? यह आदमी अपने बच्चों को कभी खिलाएगा भी?” पिता अंदर से टूट जाते, मगर चेहरे पर बेबसी का नक़ाब ओढ़ लेते।
लतीफ़ बड़ा हो रहा था, मगर बचपन की मासूमियत कहीं गुम थी। खेल-कूद के बजाय उसका वक़्त बीतता माँ की आँखों से आँसू पोंछने में, और भूख की आग से लड़ने में। भाई-बहन जब ज़ोर-ज़ोर से रोते, तो माँ उन्हें बहलाने के लिए कहती—“सो जाओ, सुबह अल्लाह हमारी झोली भर देगा।” लेकिन सुबह आती, और वही ताने, वही भूख, वही बेबसी उनका स्वागत करती।
गाँव के अमीरों के बच्चे मिठाई खाते, रंगीन कपड़े पहनते। लतीफ़ और उसके भाई-बहन नंगे पाँव धूल में खेलते, और जेब में सिर्फ़ पत्थर भरते। जब वे उन बच्चों को देखते, तो दिल में चिंगारी उठती। क्यों उनका बचपन हँसी और हमारे हिस्से आँसू हैं? यह सवाल धीरे-धीरे उसके दिल की गहराई में बैठ गया।
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ताने तो हर रोज़ सुनाई देते। कभी रिश्तेदार कहते—“इनके बच्चे तो बस बोझ हैं।” कभी पड़ोसी हँसते—“ये ग़रीबों के घरों में बस भूख और चीख जन्म लेती है।” छोटे लतीफ़ ने यह सब अपने नन्हे कानों से सुना, और उसकी मासूम आँखों ने हर अपमान को चुपचाप पी लिया।
भूख का हाल यह था कि कई बार माँ बच्चों को सुलाने के लिए पानी में गुड़ घोलकर दूध का बहाना करती। बच्चे ख़ुश होकर पी लेते, पर माँ का दिल हर बार रोता। उसने अपने बच्चों को पेट भरकर खिलाया ही कब था?
चैप्टर नंबर 6
गरीबी सिर्फ़ भूख नहीं, अपमान भी थी। गली के लोग उनके फटे कपड़े देखकर हँसते। जब लतीफ़ के भाई मज़दूरी करने जाते, तो मालिक ताने मारते—“तुम्हारे जैसे लोग काम ही क्या करेंगे? बस रोटियाँ तोड़ने आए हो।” छोटे लतीफ़ ने यह सब अपने भीतर उतार लिया।
रात को, जब पूरा गाँव सो जाता, झोपड़ी में रोशनी नहीं होती। बस अंधेरा, भूख और बच्चों की सिसकियाँ। माँ चुपके से रोती, पिता थककर ढह जाते, और बच्चे भूख से तड़पते। यही था उनका संसार।
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पाँच साल की उम्र में ही लतीफ़ ने समझ लिया कि ज़िंदगी गरीबों पर मेहरबान नहीं होती। गरीब के लिए इज़्ज़त भी सपना है, पेट भर खाना भी सपना है, और चैन की नींद भी सपना है। उसके मासूम दिल में यह बात बैठ गई कि गरीब होना सबसे बड़ा गुनाह है।
यह वही दर्द था जिसने उसके बचपन को जला दिया। यह वही ताने थे जिन्होंने उसके भीतर की आग को भड़काया। और यह वही भूख थी जिसने उसके मासूम चेहरे पर वक़्त से पहले सख़्ती की लकीरें खींच दीं।
काली रात से शुरू हुई यह कहानी, उस बच्चे की थी जो हर रोज़ ताने सुनकर बड़ा हो रहा था। वह बच्चा जो भूख से लड़ना सीख रहा था। और वह बच्चा, जो आने वाले वक़्त में—गुजरात की गलियों में एक ऐसा नाम बनेगा, जिसे मिटाना आसान न होगा।
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