अध्याय 2
गरीबी की गलियों में जन्मी बातें**
अरुण के जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसकी झोपड़ी सिर्फ एक घर नहीं रही, वह पूरे मोहल्ले की चर्चा बन गई। कच्ची दीवारों के भीतर एक नन्हा रोता बच्चा था, लेकिन बाहर सैकड़ों जुबानें थीं जो उसके भविष्य पर अपने-अपने फैसले सुना रही थीं। गाँव कोपरगाँव की गलियों में सुबह होते ही औरतों के समूह इकट्ठा होने लगे। कोई पानी भरते हुए फुसफुसाती, कोई चूल्हे पर रोटी पलटते हुए सिर हिलाती, कोई यह कहकर आगे बढ़ जाती कि “गरीब के घर पैदा हुआ बच्चा भी गरीब ही रहता है।” कुछ औरतें ऐसी भी थीं जो दया दिखाते हुए कहतीं कि भगवान ने इसे किसी खास मकसद से भेजा होगा, लेकिन उनके शब्दों में भी करुणा से ज्यादा शक छिपा होता था।
लक्ष्मीबाई जब अपने बेटे को गोद में लेकर दरवाज़े पर बैठती, तो उसके कानों तक ये सारी आवाज़ें पहुँचती थीं। वह कुछ कहती नहीं थी, लेकिन हर शब्द उसके दिल में चुभ जाता था। उसे लगता था कि लोग उसके बेटे को नहीं, उसकी गरीबी को देख रहे हैं। उसके चेहरे पर मजबूरी की मुस्कान होती और आँखों में डर। वह जानती थी कि यह समाज किसी गरीब बच्चे को सपने देखने की इजाज़त नहीं देता। हर कोई उसकी किस्मत पहले ही लिख देना चाहता है।
चैप्टर नंबर 6
गुलाबराव जब शाम को मिल से लौटता, तो रास्ते में कई लोग उसे रोककर हालचाल पूछते, लेकिन बात वहीं आकर रुक जाती कि “अब खर्च और बढ़ गया,” “इतने बच्चों को कैसे पालेगा,” “तू तो पहले ही टूटा हुआ है।” कोई सीधे यह नहीं कहता था कि यह बच्चा उसके लिए बोझ है, लेकिन हर वाक्य में वही छिपा होता था। गुलाबराव सिर झुकाकर आगे बढ़ जाता, क्योंकि उसके पास जवाब नहीं था, बस एक चुप्पी थी जो उसकी थकान से भी भारी थी।
मोहल्ले के बच्चे जब झोपड़ी के बाहर खेलते, तो उनके बड़े उन्हें खींचकर दूर कर लेते और कहते कि “अंदर मत जाओ, वहाँ गरीबी की बदबू है।” यह शब्द सुनकर लक्ष्मीबाई का दिल काँप जाता। उसे लगता जैसे उसका बच्चा किसी बीमारी की तरह देखा जा रहा हो। फिर भी वह हर सुबह अरुण के माथे को चूमती और बुदबुदाती कि उसका “माझा लेकरा” किसी से कम नहीं है। वह चाहती थी कि उसका बेटा इन बातों से दूर रहे, लेकिन वह नहीं जानती थी कि यही बातें एक दिन उसके दिल में आग बनकर जलेंगी।
गाँव के बुज़ुर्ग जब चबूतरे पर बैठते, तो अरुण का नाम भी वहाँ पहुँच जाता। कोई कहता कि यह बच्चा अपने पिता जैसा मजदूर बनेगा, कोई कहता कि इसे जल्दी काम पर लगा देना चाहिए, तो कोई मज़ाक में बोल देता कि ऐसे बच्चे या तो बहुत ऊपर जाते हैं या बहुत नीचे गिरते हैं। हर राय में एक अजीब-सी सख्ती थी, जैसे यह तय हो चुका हो कि यह बच्चा कभी सामान्य ज़िंदगी नहीं जी पाएगा। इन बातों का बोझ लक्ष्मीबाई के दिल पर पत्थर की तरह पड़ता गया।,😭
समय बीतने के साथ, गाँव की हवा में यह मान लिया गया कि यह बच्चा भी उसी चक्र में फँसेगा जिसमें उसके माँ-बाप फँसे हैं। कोई उसकी आँखों में चमक नहीं देखता था, कोई उसकी मुस्कान में भविष्य नहीं ढूँढता था। सबको सिर्फ उसकी गरीबी दिखती थी, उसकी टूटी झोपड़ी, उसके पिता के मैले कपड़े, उसकी माँ की थकी आँखें। यही उसकी पहचान बनती जा रही थी।
लेकिन उसी मोहल्ले में कुछ दिल ऐसे भी थे जो उसे देखकर दुआ करते थे। बूढ़ी औरतें उसे गोद में लेकर कहतीं कि “देव तुझा भला करो,” और बच्चे उसके पास बैठकर उसे हँसाने की कोशिश करते। यह छोटी-सी अच्छाई भी लक्ष्मीबाई के लिए उम्मीद की एक किरण बन जाती थी। वह जानती थी कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ नहीं है, बस बहुत कम लोग हैं जो उसे समझते हैं।
रात के सन्नाटे में, जब पूरा मोहल्ला सो जाता, लक्ष्मीबाई अपने बेटे को सीने से लगाकर उसकी साँसें गिनती और सोचती कि यह बच्चा किन रास्तों से गुज़रेगा। वह डरती थी कि कहीं यह दुनिया उसके दिल को भी उतना ही कठोर न बना दे जितनी यह खुद है। गुलाबराव बाहर बैठकर आसमान की ओर देखता और मन ही मन प्रार्थना करता कि उसका बेटा इस गरीबी की कैद से बाहर निकल सके।
इस तरह, अरुण की कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं रही, वह पूरे मोहल्ले की सोच का आईना बन गई। हर फुसफुसाहट, हर ताना, हर दया भरा शब्द उसके जीवन की नींव में जुड़ता गया। यही आवाज़ें एक दिन उसकी आत्मा में गूँजेंगी और उसे उस रास्ते पर ले जाएँगी, जहाँ से लौटना आसान नहीं होगा। उसकी कहानी अब सिर्फ जन्म की नहीं थी, वह समाज के फैसलों से लिखी जाने लगी थी। 😭
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